केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित ग्रामीण एक बार फिर से आंदोलन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उन्हें न तो परियोजना का उचित मुआवज़ा मिल रहा है और न ही इससे संबंधित दस्तावेज़ प्रदान किए जा रहे हैं। इस विषय पर ग्रामीणों ने पहले भी प्रदर्शन किए हैं। इस बार 5 अप्रैल से शुरू हुए इस आंदोलन को लगभग 10 दिन हो चुके हैं। प्रदर्शनकारियों ने 15 अप्रैल को सांकेतिक फांसी लगाकर अपना विरोध प्रकट किया। इसके अतिरिक्त, वे मिट्टी में धंसकर, जल सत्याग्रह करते हुए और सांकेतिक रूप से चिता पर लेटकर भी प्रदर्शन कर रहे हैं।
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर कहते हैं, "हम पानी में खड़े हैं, हम भूखे हैं, और हम चिता पर लेटने को भी तैयार हैं। अगर सरकार को हमारा बलिदान ही चाहिए तो हम पीछे नहीं हटेंगे।"
जबकि छतरपुर ज़िला प्रशासन का कहना है कि उनके जिले के 14 प्रभावित गांव में जो लोग छूट गए हैं उनका सर्वे किया जा रहा है। साथ ही मझगांव और रूंझ परियोजना के मुआवजा वितरण में विसंगतियों को दूर करने के लिए पन्ना जिला प्रशासन से बात की जा रही है। वहीं पन्ना प्रशासन के एक संयुक्त दल ने प्रदर्शन स्थल पर लोगों की समस्या सुनी और शिकायत आवेदन प्राप्त किए।
कब और कैसे शुरू हुआ आंदोलन?
कब और कैसे शुरू हुआ आंदोलन? पन्ना और छतरपुर के ये लोग ‘जय किसान संगठन’ के बैनर तले आंदोलन कर रहे हैं। भटनागर के नेतृत्व में यह संगठन केन-बेतवा परियोजना से प्रभावित लोगों को उचित मुआवज़ा दिलवाने के उद्देश्य से बनाया गया है। अप्रैल में संगठन द्वारा न्याय अधिकार पदयात्रा का आयोजन किया गया था। इसका उद्देश्य मझगांव और रुंज बांध से प्रभावित लोगों की समस्या को सुनकर उसे प्रशासन तक पहुंचाना था। ग्रामीणों का कहना था कि उन्हें भूमि अधिग्रहण कानून, ग्रामसभा और पुनर्वास की प्रक्रिया की सही जानकारी नहीं दी गई और ना ही उनकी इस पर सहमति ली गई।
संगठन के सदस्य पवन पटेल बताते हैं कि 19 मार्च को आंदोलनकारियों और प्रशासन के बीच हुई बातचीत में यह आश्वासन दिया गया कि जल्द ही ग्रामीणों के समक्ष परियोजना की सहमती से जुड़े हुए ग्रामसभा के दस्तावेज दिखाए जाएंगे। मगर लगातार पत्राचार के बावजूद जब ऐसा नहीं किया गया तो 5 अप्रैल को ग्रामीणों ने दिल्ली जाकर प्रदर्शन करने का निर्णय लिया। बकौल ग्रामीण उन्हें दिल्ली जाने से रोका गया जिसके बाद ये लोग सटई तहसील के अंतर्गत दौधन बांध के पास बैठकर प्रदर्शन करने लगे।
केन-बेतवा लिंक परियोजना के पहले चरण के तहत केन नदी पर इस बांध का निर्माण किया जा रहा है। यहाँ दो दिनों तक धरने में बैठने के बाद ग्रामीणों ने चिता आंदोलन शुरू कर दिया। आंदोलन के तीसरे दिन, ‘न्याय दो या मार दो’ के नारे के साथ ग्रामीण नदी के किनारे चिता बनाकर लेट गए। इसके बाद भटनागर ने अपने शरीर पर मिट्टी लगाकर प्रदर्शन किया। भटनागर का कहना है, “हम मिट्टी से बने हैं, उसी के लिए लड़ रहे हैं और यदि प्रशासन मिट्टी में भी मिला दे, तो भी हम आंदोलन करते रहेंगे।”
पटेल ने कहा कि परियोजना से प्रभावित छतरपुर के सभी गांवों में ‘चूल्हा बंद भूख-हड़ताल’ आयोजित की जा रही है। वह बताते हैं, "भूखे पेट बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे इस आशा में बैठे हैं कि शायद उनकी आवाज दिल्ली और भोपाल तक पहुंचेगी।"
परियोजनाएं क्या होती हैं?
निर्माण के पूरा होने के बाद दौधन बांध को उसके पूर्ण जलाशय स्तर (FRL) 288 मीटर तक भरे जाने पर कुल 9000 हेक्टेयर भूमि डूब जाएगी। इससे सबसे अधिक वन भूमि (5258 हेक्टेयर) प्रभावित होगी, लेकिन 10 गांव भी इसकी चपेट में आ जाएंगे। वहीं, मझगांव मध्यम सिंचाई परियोजना के तहत 9900 हेक्टेयर सिंचाई क्षेत्र का विकास किया जाना है। इसके लिए केन की सहायक नदी ‘बड़ा नाला’ पर 7567 मीटर लंबा और 33 मीटर ऊंचा बांध का निर्माण किया जाना है। इसके अतिरिक्त, पन्ना की अजयगढ़ तहसील के अंतर्गत रुंज नदी पर 1182 मीटर लंबा कंपोजिट बांध बनाना है। इसके माध्यम से कुल 12,550 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा प्रदान की जानी थी।
शुरूआती आकलन के अनुसार, मझगांव परियोजना के लिए 8 गांवों की 930.8 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा। कुल 1696 परिवार प्रभावित होंगे, जिनमें से 999 परिवारों को विस्थापित होना पड़ेगा। वहीं, रुंज परियोजना के तहत बनने वाले बांध से 327.19 हेक्टेयर राजस्व भूमि और 154.91 हेक्टेयर वन भूमि जलमग्न हो जाएगी। इससे आरामगंज गांव के 219 परिवार प्रभावित होंगे।
पन्ना जिला प्रशासन द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार, मझगांव परियोजना के तहत कुल 1657 खातेदारों को 1 अरब 91 करोड़ 86 लाख 80 हजार 929 रूपए की राशि स्वीकृत कर मुआवजा वितरित किया जा चुका है। वहीं, रुंज परियोजना के लिए 710 खातेदारों के लिए कुल 44 करोड़ 23 लाख 58 हजार 951 रूपए की राशि स्वीकृत की गई है। इसमें से 43 करोड़ 86 लाख 63 हजार 205 रूपए का वितरण किया जा चुका है। जिला प्रशासन ने यह स्वीकार किया है कि 36 लाख 95 हजार 746 रूपए का भुगतान अभी भी शेष है।
प्रदर्शनकारियों की मांग क्या है? भटनागर का कहना है कि अधिकारी केवल कार्यालयों में बैठकर फाइलों को अंतिम रूप दे रहे हैं, जबकि वास्तविकता बहुत भयावह है। वे कहते हैं, "प्रशासन आदिवासियों को डराकर उनकी भूमि छीनने का प्रयास कर रहा है। हम विकास के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन विकास के नाम पर आदिवासियों का विनाश स्वीकार्य नहीं है।"
यहां पर दी गई जानकारी के अनुसार, 12 से 50 वर्ष की आयु के व्यक्तियों के लिए विभिन्न प्रकार की गतिविधियों का विवरण प्रस्तुत किया गया है। यह जानकारी 2013 में एक अध्ययन के आधार पर संकलित की गई थी। इस अध्ययन में यह दर्शाया गया है कि 25 से अधिक गतिविधियों का समावेश किया गया है, जो विभिन्न आयु वर्गों के लिए उपयुक्त हैं। इसके अलावा, यह भी उल्लेख किया गया है कि ये गतिविधियां शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में सहायक होती हैं। अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार, नियमित रूप से इन गतिविधियों में भाग लेने से व्यक्ति की जीवनशैली में सुधार होता है और यह दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है।
यह ध्यान देने योग्य है कि आंदोलन की शुरुआत के दूसरे दिन, 6 अप्रैल को, छतरपुर कलेक्टर ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा-163 लागू कर दी है। इसके बाद, जिले के परियोजना प्रभावित गांवों में 5 लोगों के एकत्र होने पर रोक लगा दी गई है, बिना अनुमति सभा करने पर रोक लगाई गई है और अन्य जिलों के निवासियों को जिले की सीमा छोड़ने का आदेश दिया गया है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उन्हें चिकित्सा सेवाएं और राशन नहीं मिल रहा है। हालांकि, छतरपुर जिला प्रशासन इस बात से इनकार कर रहा है। आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, 12 अप्रैल को प्रदर्शन स्थल पर 95 लोगों का इलाज किया गया।
प्रदर्शनकारी अब भी जल सत्याग्रह और सांकेतिक फांसी के माध्यम से अपना विरोध व्यक्त कर रहे हैं। इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया के लिए हमने जिले के जनसंपर्क अधिकारी अखिल राठौर से संपर्क किया। उन्होंने हमें कलेक्टर कार्यालय के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर उपलब्ध बयान को शामिल करने के लिए कहा। बुधवार, 15 अप्रैल की शाम को कलेक्टर द्वारा विशेष दलों का गठन किया गया है। दलों द्वारा जिले के 14 गांव में मुआवजा विसंगति एवं पुनर्वास हेतु प्राप्त आवेदनों की पात्रता की जांच की जाएगी। कलेक्टर ने सभी दलों को 7 दिन में रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया है।
हालांकि, आंदोलनकारियों का कहना है कि प्रशासन पहले भी कई बार लिखित आश्वासन देकर मुकर चुका है, अब इन निर्णयों का पालन जमीन पर होना चाहिए। भटनागर ने कहा, "अब यह आंदोलन केवल अधिकारों की लड़ाई नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है। जब तक न्याय जमीन पर नहीं दिखेगा, आंदोलन जारी रहेगा।" आगे की रणनीति पर आंदोलनकर्ताओं द्वारा गुरूवार, 16 अप्रैल को बैठक का आयोजन किया गया है जिसमें आंदोलन के भविष्य पर चर्चा होगी।

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